ऐ मोत तूने हमको दर दर रुला के मारा
ऐ मोत तूने हमको दर दर रुला के मारा
घर से किये थे बेघर वन में रुला के मारा
सामान ऐश के तो सब छूट ही गये थे
फिर भी सबर ना आया दम दे रुला के मारा
ऐ मोत............................................
बनकर फ़क़ीर हमने दर दर की खाक छानी
इस खास ने फिर हमको आखिर रुला के मारा
अफसोस हर तरह से कर दी सफाई तूने
हम को जगा के मारा उन को सुला कर मारा
ऐ मोत............................................
सारी अयोध्या तूने जालिम वीरान कर दी
बेदर्द सारे कुल को क्या विश पिलाके मारा
क्या दोष है किसी का अपने कर्म है खोटे
घर के चिराग ने ही घर को जलाकर मारा
ऐ मोत............................................
Comments
Post a Comment